आज पिंजर पढ़ा, लगा अमृता प्रीतम ने अपना दिल निकाल कर रख दिया है। अंतर्मन को गहरे तक छूने वाले संवाद, कथावाचन(?) में जीवंतता भर जाते हैं।
उपन्यास के शुरुवात मैं हीं मटर की छीमी के अन्दर पल रहे कीडे को अपने अन्दर पल रहे बच्चे से तुलना करती नायिका पुरो की मनोदश बड़ी हीं मार्मिक लगती है। पर पुरो ने उस बच्चे को अपनाया, पुरो का यह स्वीकार्य इस बात को मजबूत करता है, की बच्चे कभी नाजायज नही हो सकते, रिश्ते भले नाजायज हों। किसी भी बच्चे का इस दुनिया मैं आना एक पवित्र घटना है।
एक और घटना है जिसने मुझे पिंजर को जिन्दगी भर न भूलने के लिए मजबूर कर दिया . इस घटना ने मेरे इस विश्वास को और बल दिया है, की साहित्य सार्वभौमिक है ।
मैं जिस मुहल्ले मैं रहता हूँ वहीँ एक पगली अकसर हमें नजर आती है। में नही जनता हूँ कि किस मनःस्थिति से गुजरकर वो पागल हुई, पर अक्सर, मैंने उसे बरबराते देखा है। वो भी बिल्कुल पिंजर हीं तो दिखती है, अमृता प्रीतम की चित्रित की हुई पिंजर। पर नियति इतनी क्रूर हो सकती है इसका आभास मुझे नहीं था। एक दिन ख़बर मिली किसी ने उसका बलात्कार कर दिया है। मैं अगर सत्य कहूँ, तो दुबारा मैं उसे देखना नही चाहता हूँ। ऐसा लगता है की उसे आस-पास के हर पुरूष मैं कोई बलात्कारी हीं नजर आता होगा। अब वह बिल्कुल गुमसुम नजर आती है । किसी एक के कारण वह पागल हो चुकी थी, और दूसरा भी हमारे हीं बीच का कोई है, जिसे उसकी दारुण दशा भी नजर नही आई। हमारे समाज का एक और वहसीपन हमारे सामने है ।
अब जब कभी उसपर नजर जाती है तो अनायास हीं नजर एक बार उसके पेट पर जरुर चला जाता है। अमृता, तुम्हारे 'पिंजर' की पगली मुझे अब भी अपना बड़ा पेट लिए हर तरफ नजर आती है।






