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यूनिवर्सिटी के चायघर में इंटेलेक्चुअल्स का मजमा लगा था । क्या पूंजीवाद क्या मार्क्सवाद सबके चिथड़ों से पूरा चायघर रद्दीखाने में तब्दील हो चुका था। अब तो चाय की चुस्कियों पर भी थकान का असर दिख रहा था। पर मिस्टर मार्क्ससिस्ट थे की मानते हीं नहीं, घंटों बीत गए बस एक ही बात की रट लगाये बैठे हैं, मानो या ना मानो मार्क्सवाद दुनिया का सबसे मिसइंटरप्रेटे वर्ड है। बुझते एवं जूझते हुए कई दिमागदारों ने उन्हें मानो और ना मानो के बीच किसी रास्ते को तलाशने को कहा, पर मिस्टर को राजमार्ग के डिवाईडर की तरह मानो और न मानो के बीच भी एक डिवाईडर ही नजर आया जिस पर चलना उन्हें नागवार गुजरा।

पर मुख्य वजह थी मिस इंटरप्रिटेशन । दूसरी और से मोर्चा उन्होंने ही संभाल रखा था। अपनी शक्लो सूरत से लेकर बात व्यवहार और आचार विचार सबसे उन्होंने स्तब्ध करने की कसम खा रखी थी। मिस के तेवरों ने मिस्टर की त्यौरियां चढ़ा दी थी। अचानक से उन्होंने अपनी चूलें हिलाई ऐनक चढ़ाए और बोल उठे मार्क्सवाद इतिहास का लौजिकल इंटरप्रिटेशन है। इतनी आसानी से समझ नहीं आने वाला।

उत्तेजित मिस चाय घर की सारी नैतिकताओं को मिस करते हुए बोल उठी, अरे क्या खाक लौजिकल है, ये भी कोई बात हुई, कुछ न मिला तो सोसायटी को दो भागों में बाँट दिया। एक काम करने वाले, और दूसरे पैसे लगाकर कमाने वाले। पता नहीं मार्क्स के चश्मे का पॉवर कितना था की उसे निकम्मों का एक तीसरा वर्ग दिखा हीं नहीं !! वहां बैठे तमाम इंटेलेक्चुअल्स ने एक दूसरे को देखा और समवेत स्वर में बोल उठे कौन सा तीसरा वर्ग ? मिस ने ऐंठती नजर से सबकी तरफ देखा और कहा अरे हमारी जमात हम अर्धशिक्षित संपूर्णज्ञानी शिक्षार्थियों की जमात।

सुनते हीं मिस्टर फट पड़े, चिल्लाते हुए बोले एक्सप्लेन ऑल दी इम्बेरेसिंग टर्म यूज्ड फॉर आवर जमात एंड हाउ दिस कूद बी द थर्ड क्लास ऑफ़ मार्क्स?

मिस ने एक नजर जमात पर डाली, फिर बोली अरे अब तक तो हम यूनिवर्सिटी के चक्कर लगा रहे हैं, पढाई पूरी नहीं हुई तो अर्धशिक्षित हीं हुए न, और मेरा विश्वास है की संपूर्णज्ञानी हमारे लिए इम्बेरेसिंग टर्म नहीं है। जहाँ तक मार्क्स की थ्योरी से रिलेसन का सवाल है तो हम उस जमात से बिलोंग करते हैं जिसके पास मुनाफे के लिए लगाने को पैसा नहीं है और श्रम करना हमने सीखा हीं नहीं तो ऐसा कुछ भी करने का इलज़ाम भी हमपर नहीं लगाया जा सकता। इस तरह वी आर द थर्ड क्लास ऑफ़ आवर सोसायटी। मिस्टर हक्के बक्के से मिस इंटरप्रिटेशन को सुनते रहे

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