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मैं नहीं,

मेरी कलम बेलगाम है।

मैं सोचता भर हूँ,

यह लिखती सरेआम है॥



कुचे कुचे पर यहाँ,

हादिसे तमाम हैं।

मुखालिफत करूँ कहाँ,

हर दफ्तर यहाँ हम्माम है॥



दवा हो, दुआ हो,

हर नुस्खा यहाँ नाकाम है।

किस राह जाये राही,

यहाँ तो हर गली बदनाम है॥




डर मत अंधेरों से,

ये तो आते हरेक शाम हैं।

बढ़ता चल बेफिक्र तू,

जहाँ तेरा मुकाम है॥



थक चुके हैं पाँव,

हौसलों को कहाँ आराम है।

जीतेगी एक दिन जिन्दगी,

ये चर्चे भी यहाँ आम हैं॥


1 comments:

  1. खूबसूरत ग़ज़ल!!!!!