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(तीन वर्ष पूर्व मैंने इसे लिखा था, जाहिर है अनुभव और क्षमता दोनों आज से तीन वर्ष पुरानी (कम) हीं होगी। अपनी डायरी से ये पन्ना आपके लिए प्रकाशित कर रहा हूँ)

आज पिंजर पढ़ा, लगा अमृता प्रीतम ने अपना दिल निकाल कर रख दिया है। अंतर्मन को गहरे तक छूने वाले संवाद, कथावाचन(?) में जीवंतता भर जाते हैं।

"जब भी कोई लड़की चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, लौटकर अपने ठिकाने पहुँच जाती है तो मैं समझती हूँ की मेरी आत्मा भी उसी के साथ ठिकाने पहुँच गई है"
अमृता प्रीतम ने इस एक पंक्ति मैं कितना कुछ कह दिया है । सोचता रहा, पहले तो यही समझ नही आया की वो कौन से ठिकाने की बात कर रही है ? वह कौन सा ठिकाना है जहाँ वह पूरी तरह सुरक्षित है ? कभी कभी तो अपना घर भी उनके लिए पूरा सुरक्षित नही होता; और एकबारगी तो ऐसा लगा, कहीं वो मौत की बात तो नहीं कर रही है ! कहीं वो ठिकाना मौत तो नहीं है !! जो कुछ भी हो अंर्तद्वंद जारी है। देखें निष्कर्ष कहाँ ले जाता है !!

उपन्यास के शुरुवात मैं हीं मटर की छीमी के अन्दर पल रहे कीडे को अपने अन्दर पल रहे बच्चे से तुलना करती नायिका पुरो की मनोदश बड़ी हीं मार्मिक लगती है। पर पुरो ने उस बच्चे को अपनाया, पुरो का यह स्वीकार्य इस बात को मजबूत करता है, की बच्चे कभी नाजायज नही हो सकते, रिश्ते भले नाजायज हों। किसी भी बच्चे का इस दुनिया मैं आना एक पवित्र घटना है।

एक और घटना है जिसने मुझे पिंजर को जिन्दगी भर न भूलने के लिए मजबूर कर दिया . इस घटना ने मेरे इस विश्वास को और बल दिया है, की साहित्य सार्वभौमिक है ।

मैं जिस मुहल्ले मैं रहता हूँ वहीँ एक पगली अकसर हमें नजर आती है। में नही जनता हूँ कि किस मनःस्थिति से गुजरकर वो पागल हुई, पर अक्सर, मैंने उसे बरबराते देखा है। वो भी बिल्कुल पिंजर हीं तो दिखती है, अमृता प्रीतम की चित्रित की हुई पिंजर। पर नियति इतनी क्रूर हो सकती है इसका आभास मुझे नहीं था। एक दिन ख़बर मिली किसी ने उसका बलात्कार कर दिया है। मैं अगर सत्य कहूँ, तो दुबारा मैं उसे देखना नही चाहता हूँ। ऐसा लगता है की उसे आस-पास के हर पुरूष मैं कोई बलात्कारी हीं नजर आता होगा। अब वह बिल्कुल गुमसुम नजर आती है । किसी एक के कारण वह पागल हो चुकी थी, और दूसरा भी हमारे हीं बीच का कोई है, जिसे उसकी दारुण दशा भी नजर नही आई। हमारे समाज का एक और वहसीपन हमारे सामने है ।

अब जब कभी उसपर नजर जाती है तो अनायास हीं नजर एक बार उसके पेट पर जरुर चला जाता है। अमृता, तुम्हारे 'पिंजर' की पगली मुझे अब भी अपना बड़ा पेट लिए हर तरफ नजर आती है।

2 comments:

  1. Shayad main kuch jyada hi bhavnatmak ho gaya hun magar pinjar ka ek ek drishya meri aankho ke saamne hai jo mujhe jhakjhor raha hai..
    Hamara samaj undar se ekdam khokhla hai jiski aatma kahin dur chali gayi hai, bas ek parthiv sharir pada hai apni antyeshti ke liye...
    Puro bas es kahani ka ek kirdaar na ho ke sampoorna naari samaj ka aaina hai, ek sachhai jiska samna shayad ham bhi nahin kar pate..
    is samaj ko phir se jivant hone ke liye nari ki taakat aur uski duaon ki aavashyakta hai jo kho gayi aatma ko mare sharir me phir se laane ka chamatkar kar sakti hai.

  1. awsome wrk done sachin!i m sure dat after reading ur blog many pple r gonna rush 2 get a copy of amrita pritam's PINJAR...even i m gonna read...or if u hav plz giv it 2 me..ha ha