(ये तीन पद्य अलग-अलग समय लिखे गए हैं पर दुर्भाग्यवश अधूरे रह गए थे। इनमें भावों की समानता को देखते हुए मैं इन्हें एक साथ प्रकाशित कर रहा हूँ।)
1
उँगलियाँ उलझाये एक दुसरे को निहारने भर की ही नहीं,एक कप कॉफी पर विचार-मंथन की भी तमन्ना है मेरी।
प्रेम की नाजुक गलियों का कोमल एहसास भर नहीं,
साझा करना चाहता हूँ वास्विकता की कंटीली डगर भी।
2
विवशता न हो मेरा प्यार तुम्हारे लिए,न चाहने का भी तुम ले सको फैसला।
खो न जाना तुम मेरी विशालता के सूनेपन में,
और मिट न जाना मेरी संकीर्णता के घुटन में।
3
देखना है तुम्हे आसमा की बुलंदिओं पर,और खुद के पगचिन्हों को कभी कभार तुम्हारे साथ।
चाहता हूँ करूँ खुद का थोडा-थोडा अर्पण,
और समय के साथ तुम्हे थोडा-थोडा ग्रहण।
