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वर्षो बीत गए अपना गावं नहीं देखा, अब तो जाने का उत्साह भी नहीं रहा। पर यादें हैं, की जब-तब खिलखिला हीं उठती हैं, और तब खुद पर काबू करना मुश्किल हो जाता है। गोबर से लिपे आँगन में धमाचौकड़ी मचाते बच्चे, अलाव घेरकर बैठे व्यस्क और पता नहीं किन-किन बातों पर एक दूसरे के कान में फुसफुसाती और हंसती महिलाएं सब श्वेत-श्याम फिल्म की भांति आखों के सामने से गुजरने लगता है। मेरी यादों की किताब के पीले पर चुके इन पन्नों में कुछ तो बिल्किल अनन्य है, फिर कभी भी कहीं भी देखने को नहीं मिले। मकर संक्रांति का पर्व उन्हीं में से एक है।

भारत के अधिकांश हिस्से में यह पर्व अलग-अलग नाम एवं तरीके से मनाया जाता है। तिल और गुड़ की लाई, दही-चूड़ा, खिचड़ी और पता नहीं कितने तरह की खाने पीने की चीजों के लिए मशहूर यह त्यौहार पुरे भारत में उत्साह से मनाया जाता है।
मिथिलांचल में इस पर्व को मानाने की एक बड़ी हीं अदभुत और भावुक परंपरा है। पूजा-पाठ के बाद घर के बूढ़े-पुराने लोग अपने पास प्रसाद की कटोरी लेकर आँगन या फिर दरवाजे पर बैठ कर घर और आस पडौस के अपेक्षाकृत कम उम्र के लोगों का इंतजार करते हैं। प्रसाद लेने आने वाले प्रत्येक व्यक्ति से वे एक हीं सवाल पूछते हैं "तिल तिल बध देबअ?" प्रसाद मांगने वाला अगर इसका उत्तर हाँ में नहीं देता है तो उसे किसी भी कीमत पर प्रसाद नहीं मिलता है। बचपन में प्रसाद खाने की जल्दी में हमेशा 'हाँ' बोलकर अपनी जान छुडा लिया करता था। उस समय इस सवाल का अर्थ मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता था।

किशोरावस्था में पहुंचा तो इस सवाल का मतलब जानने की उत्सुकता हुई। मुझे अब भी वो लम्हा याद है जब मेरी दादी ने मुझे बताया था, इसका मतलब होता है 'क्या मेरे मरने के बाद तुम मेरी अर्थी को कन्धा दोगे?' मुझे लगा था हाँ मैं नहीं दूंगा तो कौन देगा? मकर संक्रांति के दिन, मरने से पहले हीं ये बूढ़े-बुजुर्ग, श्मशान तक अपने पहुचने कि जिम्मेवारी अपने बच्चों को सौंप देते हैं।

आज जब भी इस प्रश्न का विश्लेषण करता हूँ तो समझ में आता है कि वो केवल प्रश्न भर नहीं है, बल्कि एक सौगंध है जो बड़े-बुजुर्ग अपने बच्चों को देते हैं। वे अपने बच्चों को सौगंध देते हैं कि मरने के बाद वे उन्हें अपने कंधे पर श्मशान ले जायेंगे, इन तिल के दानों के बदले में उनके चिता कि लकड़ी सजायेंगे।
वर्षों बीत गए मकर संक्रांति का पर्व घर पर नहीं मनाया। जाहिर है इन वर्षों में किसी ने कंधे पर श्मशान ले जाने की कसम भी न दी। पर में तो उन अभागों में हूँ जिसने कभी अपने तिल कि सौगंध पूरी हीं नहीं की, या यूँ कहें समय और परिस्थितियों ने पूरी करने हीं न दी। इस वर्ष मकर संक्रांति के बस चार दिन पूर्व अपने सौ से अधिक उम्र के परदादा की मृत्यु ने ये टीस और बढ़ा दी।

कन्धों पर कभी-कभी कुछ भारी सा लगता है, शायद तिल का हीं भार है !!!

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