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(दिसम्बर १८, मेरा जन्मदिन है. मैं उसी दिन इसे पोस्ट करना चाहता था, पर बी.एच.यू. की इन्टरनेट सर्विस से धोखा खाया, अब इस पोस्ट के साथ हाज़िर हूँ.)

सबसे पहले एक प्रचलित सोहर जो मुझे कविता कोष के माध्यम से मिली, उसे मैं यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ.

जुग जुग जियसु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो
ललना लाल होइहे, कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो॥
आज के दिनवा सुहावन, रतिया लुभावन हो,
ललना दिदिया के होरिला जनमले होरिलवा बडा सुन्दर हो॥
नकिया त हवे जैसे बाबुजी के,अंखिया ह माई के हो
ललन मुहवा ह चनवा सुरुजवा त सगरो अन्जोर भइले हो॥
सासु सुहागिन बड भागिन, अन धन लुटावेली हो
ललना दुअरा पे बाजेला बधइया, अन्गनवा उठे सोहर हो॥

नाची नाची गावेली बहिनिया, ललन के खेलावेली हो
ललना हंसी हंसी टिहुकी चलावेली, रस बरसावेली हो॥
जुग जुग जियसु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो
ललना लाल होइहे, कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो॥

मेरा अपने घर परिवार के रिती रिवाजों से बहुत सरोकार नहीं रहा है. इसी कारण मुझे सोहर की परंपरा का भान भी अपने उम्र के दुसरे दशक के उत्तरार्ध में हुआ. लेकिन जब से मैंने इस परंपरा को जाना है, तब से हीं कई सवाल हमेशा मेरे मन में आते रहे हें. हमेशा से मैंने वो समय अपने जेहन में उतारने की कोशिश की है जब मेरे जन्म पर सोहर गाये गये होंगे. घर की उन महिलाओं के चेहरे को ध्यान में लाने की कोशिश की है, जिन्हें बाद में मैंने अपने घर के शादी विवाह जैसे समारोह में पारम्परिक गीत गाते देखा है.

उसी हंसी ख़ुशी के माहौल में मुझे अपनी नन्ही सी दीदी का चेहरा भी कहीं कहीं नजर आता है, जो आज उम्र के इस पड़ाव पर भी अपने जन्म पर सोहर जैसा कोई गीत गाये जाने की कल्पना भी नहीं कर पाती होगी. हाँ, सोहर में उसके हिस्से की ख़ुशी उसे अपने भाई के जन्म पर अवश्य हीं मिली होगी.
"नाची नाची गावेली बहिनिया, ललन के खेलावेली हो
ललना हंसी हंसी टिहुकी चलावेली, रस बरसावेली हो॥"

यहाँ ये बातें लिखने का ये मतलब कदापि नहीं है, कि मेरी दीदी का जन्म मेरे घर परिवार वालों के लिए ख़ुशी का अवसर नहीं था. लिखने का मतलब बस इतना है कि उसके जन्म की ख़ुशी को कोई सामाजिक सरोकार नहीं मिला होगा, जो मुझे मिला. हम सभी भाई बहनों के जन्मदिवस की स्मृतियां जब कभी मेरी माँ के मानस पटल पर आती होंगी तो मुझे विश्वास है मेरी बहन के जन्मोत्सव समारोह की यादों में कुछ छुटा सा या फिर कुछ खाली-खाली सा तो वो भी महसूस करती होंगी.

हाँ, एक आखिरी बात जो रह गयी. यहाँ तो मैंने खुद को मोहरा बना लिया. आप अपनी स्मृतियों को सहेजने की कोशिश करिए, शायद हमलोग एक हीं तरह की यादों को समेटे हुए हों !!!

3 comments:

  1. Haa, tumhari baat to sach hai. Hum sab lagbhag usi tarah ki khushiya samete hue hai.Lekin ek bat btao bhai tumhari memory badi sharp hai, utne chote se the tum us waqt aurtumko sab yaad hai,BRILLIANT.Ha ha ha ha ha, just joking.

  1. Yaar ye mera khud ka Anubhav raha hai ki Hamare ghar yahan ki Parampara hamesha se ek vivaad ka vishay thi.
    Meri bahno ko mujhse jyada pyar aur adhikar mila lekin ye riti duniya ko pasand nahin hai. chhah ke bhi ham shadiyo purani us soch ko nahin badal pa rahe hain jo keval janm ke hisab se bhedbhav karti hain..
    Magar ab samay badal raha hai.
    Parivartan baahein pasare, agle mod pe hamara intezaar kar raha hai

  1. d day i was born my grandfather who is no mre had met wid an accident bt 2 my gud luck he survived nd named me Lakshmi nd dats why this name is vry close 2 my heart...bt wen my mom tells me d stories of my she neva 4gets 2 mention my grandfathr who was d happiest person on my birth unlyk my granny who wanted a grand son....thankfully times hav changed now nd evrybdy wants a gal child as pple hav realised d impartance of gals...........